भागता पर्व क्यू मनाया जाता हैं ?

भागता पर्व आदिवासियों का परिचायक पर्व है। विशुद्ध आदिवासी संस्कृति का पर्व है। इस पर्व का खास आकर्षण, गायन-नाच होता है जो पंद्रह दिन पूर्व से ही शिव मंदिर के अखड़ा में शुरू हो जाता है। आखिरी रात छाऊ-नाच करके रतजगा किया जाता है।

*आदिवासियों का प्रमुख त्योहारों में से एक भागता पर्व भी है।


भोक्ता पर्व में भगवान शिव के प्रति अगाध श्रद्धा व भक्ति के समायोजन सहित झारखंडी संस्कृति का समावेश है। यह लोकपर्व झारखंड के ग्रामीण इलाकों में उत्साह पूर्वक मनाने के अलावा निकटवर्ती राज्य पश्चिम बंगाल व उड़ीसा में भी उल्लासपूर्ण वातावरण में मनाया जाता है जिसके साधक को स्थानीय भाषा में भक्तियां कहते हैं। कई स्थानों पर इस पर्व को मंडा पर्व, विशु पर्व, चड़क पर्व, शिव पूजा आदि के नाम से भी जाना जाता है, जो बांग्ला चैत संक्रांति में मनाया जाता है। शिव उपासना का पर्व होने के कारण इसे शिव मंदिरों में मनाने की परंपरा है। इसमें भक्तों की अटूट श्रद्धा भगवान शिव के प्रति रहने के कारण वे सहज ही दहकते अंगारे पर चलने सहित शरीर में नुकीली कील घोंपने के बाद भी मदमस्त रहते हैं।



इसमें श्रद्धालु अपनी पीठ में लोहे के हुक घोंपकर रस्सी के सहारे करीब 30-35 फीट की ऊंचाई पर लटक कर शिवशंकर भोले बाबा व माता पार्वती का नारा लगाते हुए चारों तरफ चक्कर लगाते हैं। जबकि कई स्थानों पर भक्तियां अपनी जीभ पर त्रिशूल भी घोंपते हैं तो कहीं पीठ को लोहे के हुक से छिदवाकर तथा उसके सहारे पुजारी को बैलगाड़ी में बैठाकर खींचते हैं। जबकि कई जगहों पर जीभ में लोहे के हुक घोंपकर डंडे पर झूलने की परंपरा है।


सिंदूर लगाने से ही जख्म भर जाता है







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